JIA : एक आध्यात्मिक महोत्सव
JIA : एक आध्यात्मिक महोत्सव
श्रुतसंवेगी महाश्रमण श्री 108 आदित्यसागर जी मुनिराज के मानस पटल में राष्ट्र एवं धर्म की उन्नति का एक ऐसा वृक्ष पल्लवित हो रहा है जिसकी शाखाएँ लोक कल्याण, युवा उत्थान, धर्म जाग्रति, इतिहास संरक्षण, करुणा एवं एकता के रूप में फैली हुई हैं।
जो युवा जिनशासन के यश आकाश में सम्यक प्रभावना के नव-नक्षत्र गढ़ रहे हैं, जो युवा अपने प्रयासों से, कार्यों से, कला से, शिक्षा से, साधना से अथवा साहस से "शाश्वत श्रमण संस्कृति" के अप्रमित वैभव को वर्धमान कर रहे हैं, ऐसे "जिनशासन के अदृश्य स्तंभों को सम्मान, प्रोत्साहन एवं साहस देने का नाम है - JIA
JIA एक क्रांति है, सुप्त हो रही युवाशक्ति को उठाने की, JIA एक क्रांति है, जिनशासन के परचम को लहराने की, JIA एक क्रांति है, साहस, एकता, सद्भावना जगाने की, JIA एक क्रांति है, भारत को पुनः "विश्व गुरु" बनाने की।
भारत वर्ष के हृदय प्रदेश में संस्कारधानी कहे जाने वाले जबलपुर महानगर में पिता राजेश और माँ वीणा के घर आँगन में 24 मई 1986 को एक ऐसे शिशु का जन्म हुआ, जो सौभाग्य और समृद्धि का पर्याय था. जिसका आगमन इस धरापटल पर पुण्य-चन्दन के लेपन के समान था। नियति ने उसे नाम दिया "सम्मति"। जिसका नाम सन्मति यानी भगवान महावीर स्वामी का पर्याय हो. उसमें "गुरुता" के सद्गुणों का विकसित हो जाना सहज ही है. शायद इसी लिए भी सन्मति भैया को "गुरु मैया" के नाम से भी जाना जाने लगा। अठखेलियों और शरारतों के प्रेमी बालक सम्मति किसी कल्पवृक्ष की शाखा के समान बढ़ने लगे३अंतर बस इतना था की कल्पवृक्ष उसके समक्ष कल्पना करने वालों को कुछ देता है, परंतु आप भविष्य में बिन मांगे ही सब को सब कुछ देने वाले थे। सन् 1998 में महावीर जन्मकल्याणक के दिन से ही मात्र 12 वर्ष की उम्र में सन्मति ने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाना शुरू किया, और देखते ही देखते सन् 2008 तक एक प्रतिष्ठित व्यापारी के रूप में उमरे। 2006 में B.B.A. की डिग्री एवं 2008 में M.B.A. (Gold medalist) की डिग्री पूर्ण कर अपनी लौफिक शिक्षा की यात्रा को विराम दिया। परंतु आपकी उत्कृष्ट चिंतन धारा एवं अतुलनीय प्रज्ञा इस लौकिक शिक्षा से कई गुना अधिक थी।
सन् 2008 में आचार्य श्री विशुद्धसागर जी यतिराज के दर्शन कर, सन्मति की हृदयभूमि पर गुरु समर्पण और वैराग्य का ऐसा अंकुरण हुआ जिसने "सम्मति" फो सदा के लिये "विशुद्ध-फल्पतरु" की छांव रहने को उधत कर दिया, और ऐसा हो भी क्यों ना! शायद नियति जानती थी कि "जो जैसा बनने वाला है. उसे पैसे के ही साथ रखना जरूरी है। उज्जैन की धरती पर सन् 2010 वह वर्ष बना जब गुरु आशीष से सन्मति के मस्तक पर आजीवन ब्रह्मचर्य का तिलक लग गया। और अपनी परिपक्य मेघा, उत्कृष्ट संस्कारशीलता, अनुपम गुरु समर्पण एवं उत्कृष्ट विचार मंजूषा के कारण 08 नवंबर 2011 को सन्मति मैया यानी गुरु मैया को अपने इस मानव जीवन की सार्थकता का प्रमाण युग गौरव आचार्य श्री विशुद्धसागर जी के कर कमलों से "निर्घन्ध" पद के रूप में मिला और गुरु मैया अब मुनिश्री आदित्यसागर जी बन गये। सन् 2012 में मात्र 21 दिनों में आप ने प्राकृत भाषा का अध्ययन पूर्ण करके अपनी असाधारण बुद्धिलब्धि का परिचय दिया। 2016 में गुरुमुख से संस्कृत भाषा एवं 2018 में बेंगलुरु जा कर द्रविड़ीयन भाषाएँ. अप्प्रभ्रंश, हाड़े कन्नड़, नाडो कन्नड़, होसो कन्नड़ एवं तमिल भाषा जैसी 16 लिपियों में निष्णात हुये। सन् 2018 से 2024 तक बेंगलुरु, सागर, इंदौर, मीलवाड़ा एवं कोटा जैसे शहरों में चातुर्मास के माध्यम से जिनशासन की अभूतपूर्व प्रभावना की। जिनशासन पर आने वाली विपदाओं अथवा कुरीतियों के खलिाफ आपकी निर्भयता और शब्दशक्ति अतुलनीय है।
देश के 9 राज्यों में लगभग 4000 किलो मीटर विहार करते हुये, आपने 50000 श्लोक प्रमाण सम्यक साहित्य की रचना की, जिसमें 45 प्राकृत, 20 संस्कृत एवं 120 से अधिक हिंदी रचनाएं सम्मिलित हैं। साथ ही 25+ ग्रंथों का संपादन आपके श्री कर से हुआ।
जिनके संघ में वर्तमान समय में पूज्य श्रुतप्रिय अमणरत्न श्री 108 अप्रमितसागर जी, सहजानंदी अमणरत्न श्री 108 सहजसागर जी एवं क्षुल्लक श्री 105 श्रेयससागर जी मुनिराज रत्नत्रय के समान शोभायमान हो रहे हैं।
ॐ Ignoray नमः, ॐ Deletay नमः, आपका "I Can" आपके "IQ" से बड़ा होना चाहिये और नित्यं आदित्यं-आनंदं जैसे ऊर्जात्मक एवं सकारात्मक जीवन के मंत्र देने वाले पूज्य श्रुतसंवेगी महाश्रमण श्री 108 आदित्यसागर जी मुनिराज इस धरापटल पर साधुता की जीवंत परिभाषा है।
सोशल मीडिया के माध्यम से जैन-जैनेत्तर तक सर्वाधिक सुने जाने वाले जैन संत, युवाओं के प्रेरणा स्रोत, "आध्यात्मिक प्रबंधन", "नीति कक्षा" एवं "सही बातें" जैसी रचनाओं के माध्यम से मोटिवेशन और साहस के पर्याय बन चुके पूज्य श्रुतसंवेगी महाश्रमण श्री 108 आदित्यसागर जी मुनिराज ने प्राचीन एवं पूर्वाचार्यों के श्रुत (साहित्य) के संरक्षण हेतु ताड़पत्र एवं ताम्रपत्र संबंधी क्रान्ति की शुरुआत की एवं अभी तक लगभग 1000+ शास्त्रों का संरक्षण कराया एवं वर्तमान में जारी है। आपकी साधना, जाप एवं मंत्रज्ञान अतिशय रूप प्रभावशाली है, जिसके माध्यम से अनेकों गुरुभक्तों के जीवन में असाधारण बदलाय देखने में आते हैं।
व्यामोह से मोहित जग में, मोक्षमार्ग की आशा हैं.
मूले-मटके पथिक जनों के, जीने की अभिलाषा हैं.
कोई पूछे गर तुम से आ कर. साधु किन को कहते हैं ?
तो कहना आदित्यगुरु की चर्चा ही साधु की परिभाषा है।
उनकी कृति “तनाव प्रबंधन” मन की शांति, भावनात्मक संतुलन और सजग जीवन-दृष्टि का संदेश देती है। इसी प्रेरणा से प्रतियोगिता में प्रतिभागियों को प्रभावशाली एवं सकारात्मक विषयों पर मौलिक अभिव्यक्ति के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
प्रेरणादायी साहित्य
“तनाव प्रबंधन” के माध्यम से मानसिक शांति और संतुलित जीवन का व्यावहारिक संदेश।
सकारात्मक दिशा
करुणा, आत्मचिंतन और समाजहित को रचनात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ने की प्रेरणा।